Better then before hindi book summary

इंट्रोडक्शन ( Introduction )

क्या आप जानना चाहते है कि गुड हैबिट्स कैसे डाली जाए ? न्यू हैबिट्स कब और कहाँ से शुरू की जाए ? दरअसल जो चीज़े हम डेली बेसिस पर करते है , वो हमारी हैबिट्स बन जाती है . शुरुवात में कोई भी नई हैबिट अपनाने में थोड़ी मुश्किल तो होती है लेकिन धीरे – धीरे कुछ टाइम बाद आप इसके आदी हो जाते है।

ये बुक आपको अपनी डेली रूटीन में बेड हैबिट्स चेंज करके गुड हैबिट्स अपनाने में हेल्प करेगी . आप शायद सोच रहे होंगे ” क्या हैबिट्स इतनी इम्पोर्टेट है ? ‘ तो जवाब है “ जी हाँ , बिलकुल ” . हैबिट्स आपकी लाइफ बना सकती है , आपकी पूरी लाइफ ऐसे चेंज कर सकती है कि आप सोच भी नहीं सकते . जैसे अगर आप कैलोरी काउंट की हैबिट नहीं डालोगे तो आपको पता ही नहीं चलेगा कि आप कितनी मिठाईयां खा चुके है . आपको कैसे पता चलेगा कि अब तक आपने कितनी बुक्स पढ़ ली है जब तक कि आप रिकार्ड्स रखने की हैबिट नही डालोगे . जब हम हैबिट्स की बात करते है तो ये बुक आपको समझने में हेल्प करेगी कि आप किस टाइप के इंसान है . इस बुक से आप अपनी बेड हैबिट्स को गुड हैबिट्स में चेंज करना सीखोगे और इसमें जो स्ट्रेटेज़ी दी गयी है उनसे आपको अपने अंदर गुड हैबिट्स डेवलप करने हेल्प मिलेगी .

Better then before hindi book summary

Better then Before

1.द फेटफुल टेडेन्शीज़ वी ब्रिग इनटू द वर्ल्ड ( The Fateful Tendencies We Bring into the World ) )

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इस पूरी दुनिया में आप खुद में अकेले एक हो . और ये फैक्ट है . आपके पास जो एबिलिटीज़ है , जो पोटेंशियल्स है , वो किसी और के पास नहीं है . आप यूनीक हो . और इस बात पे आपको बिलीव होना चाहिए . अगर आप सोचते हो कि जो तरीका दूसरों के लिए काम करता है , वही आप पर फेल क्यों हो जाता है ? तो हम आपसे कहेंगे कि खुद को इस बात के लिए कभी ब्लेम मत करो और ना ही कोई सेल्फ – डाउट रखो . अब जैसे कि अक्सर लोग क्लास में अपने लैपटॉप से नोट्स लेते है क्योंकि इससे आसानी रहती है . लेकिन आपको लैपटॉप यूज़ करने में प्रोब्लम होती है क्योंकि आपको पेपर पर लिखना ज्यादा ईजी लगता है . हैबिट्स हमारे रूटीन काम होते है जो हम डेली बेसिस पर करते है , जैसे कि कई बार हमे किसी हैबिट को अडॉप्ट करने में मुश्किल होती है क्योंकि जो टेक्नीक्स दुसरे यूज़ करते है वही आप को करने में मुश्किल होती है . लेकिन इसमें आपकी कोई गलती नहीं है . बात बस इतनी सी है कि हैबिट्स अडॉप्ट करने का सबका एक डिफरेंट पेस होता है . हो सकता है जो आपको मुश्किल लगे , वही दूसरे के लिए बेहद आसान हो . कोई हैबिट प्रेक्टिस करने में ईजी है या डिफिकल्ट , इसका एक और रीजन है . और वो रीजनउस हैबिट से जुड़ी हुई लेवल ऑफ़ एक्स्पेक्टेशन दो टाइप की होती है . फर्स्ट है आउटर एक्सपेक्टेशन जो दूसरों से आती है और सेकंड है इनर एक्सपेक्टेशन जो आपके अंदर से आती है . अगर किसी हैबिट के साथ हाई लेवल की एक्सपेक्टेशन हो तो आप उस हैबिट को पोजिटिव वे में रिस्पोंस दोगे . हैबिट्स के हिसाब से रीस्पोंस करने वाले लोग चार टाइप के होते है . पहले आते है

अपहोल्डर्स , फिर क्वेशचनर्स , फिर ओब्लिगेर्स और लास्ट में रेबेल्स . ये चार टाइप की टेन्डेसीज़ है जो हमारे नजरिये को इन्फ्लुएंश करती है कि आप चीजों को किस तरह देखते है और किस तरह से बिहेव करते है . और सबसे इम्पोर्टेट ये कि इसी से डिसाइड होगा कि आप हैबिट्स कैसे फॉर्म करेंगे . अपहोल्डर्स अपनी इनर और आउटर दोनों एक्सपेक्टेशन पर खरा उतरना चाहते है क्योंकि उन्हें अच्छा लगता है . अब चाहे ये सुनने में कितना ही पॉइंटलेस लगे . ये लोग जितना हो सके हर कीमत पर मिस्टेक अवॉयड करते है . इनकी एक्सपेक्टेशन काफी हाई लेवल की होती है . यही रीजन है कि अपहोल्डर्स कोई भी हैबिट्स जल्दी अडॉप्ट कर लेते है . अपहोल्डर्स के पास डेली टू डू लिस्ट होती है जिसे वो जितना जल्दी हो सके पूरा करने की कोशिश करते है . इनकी कमिटमेंट इतनी स्ट्रोंग होती है कि कोई बीमारी या फिजिकल इंजरी भी इन्हें नही रोक सकती . हालाँकि ज्यादातर अपहोल्डर्स आउट से ज्यादा अपनी इनर एक्सपेक्टेशन पर फोकस करते है क्योंकि ये अपनी सेल्फ – प्रीजेर्ववेशन को वैल्यू देते है .

सेल्फ प्रीज़र्वनेस उन्हें खुद की एक्सपेक्टेशंस पूरी करने के लिए मोटिवेट करती है . जैसे कि कोई अपहोल्डर जो एक्सरसाइज़ करने की सोच रहा है , वो अपने फ्रेंड बड़े आराम से ये बोल सकता है ” सॉरी , मै तुम्हारे साथ बाहर लंच पे नहीं जा सकता . अपहोल्डर्स में एक और खूबी होती है कि वो अपने रूल्स बड़े स्ट्रिक्टली फोलो करते है . अगर किसी दिन कोई मिस्टेक हो जाए तो बड़ा गिल्टी फील करते है . एक बार की बात है , ग्रेटचेन को एक बरिस्ता में काम करने वाली लडकी ने बताया कि उसे वहां पर अपना लैपटॉप यूज़ करना अलाउड नहीं है . पर इतने साल गुजरने के बाद भी वो इस बात को भूली नहीं . जब भी उसे कॉफी शॉप में अपना लैपटॉप यूज़ करना होता है तो वो टेंशन में आ जाती है .

अगला टाइप का क्वेशचनर्स का . क्वेशचनर्स को अपनी एक्सपेक्टेशन पर डाउट होता है . ये लोग एक्सपेक्टेशन पर तभी रीस्पोंड करते है जब उन्हें उसमे कोई लोजिक दिखता है . क्वेशचनर्स इस लोजिक के साथ जीते है कि हर एक्शन का कोई ना कोई पर्पज होना चाहिए . और तभी वो अपनी इनर एक्सपेक्टेशन रेडी करते है ताकि वो उन्हें फोलो कर सके . फ्रेड एट होम डैड और एक क्वेशचनर है . जब उसके बेटे को प्रिंसिपल ने शर्ट पेंट के अंदर टक करने को बोला तो फ्रेड ने पुछा ” इससे क्या होगा ? ” और फ्रेड को बड़ी हैरानी हुई जब प्रिंसिपल ने कहा ” बच्चो को रूल्स फोलो करने सीखने चाहिए ” . क्वेशचनर को जब कोई हैबिट रीजनेबल लगती है तभी वो उसे अडॉप्ट करता है . लेकिन अगर उसे किसी हैबिट में या रुल में कोई लोजिक ना लगे तो उसके लिए उस हैबिट को अपनाना बड़ा मुश्किल होता है . अगले आते है ओब्लिगर्स जो हमेशा दूसरों की ख़ुशी चाहते है।

इन लोगो को अपनी इनर एक्सपेक्टेशंस पूरी करना मुश्किल काम लगता है जैसे कि हेल्दी डाईट लेना . ओब्लिगर्स का माइंडसेट कुछ ऐसा होता है कि ये लोग अपने लिए प्रोमिस तोड़ सकते है पर दूसरो के लिए नहीं . और यही रीजन है कि ओब्लिगर्स अपने लिए न्यू हैबिट्स फॉर्म करने के लिए दूसरो पर डिपेंड रहते है . हमेशा क्योंकि उन्हें मोटिवेशन के लिए कोई आउटर सोर्स चाहिए होता है . अब जैसे ग्रेस को ही ले लो . वो एक यंग प्रोफेशनल है जो रीडिंग की हैबिट डालना चाहती है।

हालंकि ये एक इनर एक्सपेक्टेशन है पर ग्रेस रीडिंग के लिए माइंड नहीं बना पाती है , इसलिए वो कोई बुक क्लब ज्वाइन करना चाहती है जहाँ पर उसे ऐसे लोग मिले जिन्हें देखकर वो इंस्पायर हो सके . चक एक यंग बॉय है जो अभी – अभी ग्रेजुएट होकर एक नए शहर में शिफ्ट हुआ है . उसे अपनी कपड़ो की अलमारी ठीक से अरेंज करनी है . तो चक ने एक चैरिटी ग्रुप को कांटेक्ट करके उन्हें अपने एक्स्ट्रा कपडे डोनेट कर दिए ताकि वो कपड़े किसी के काम आ सके . अब क्योंकि ओब्लिगर्स दूसरो पर डिपेंड रहते है इसलिए ये लोग अक्सर काफी प्रेशर में रहते है . ये दूसरों को कभी ना नहीं बोल सकते . माइक एक मार्केटिंग प्रोफेशनल है . एक बार उसके कलीग ने उससे एक रीपोर्ट फिनिश करने में हेल्प मांगी तो माइक मना नहीं कर पाया . और नतीजा ये हुआ कि उसका अपना प्रोजेक्ट ही पूरा नही हो पाया . लास्ट में रेबेल्स आते है जो आउटर और इनर दोनों एक्सपेक्टेशन को अवॉयड कर सकते है . इनके लिए इनकी फ्रीडम सबसे इम्पोर्टेट है चाहे कैसा भी काम हो . ये लोग अपनी शर्तों में काम करना पसंद करते है।

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इन्हें किसी काम के लिए फ़ोर्स नहीं किया जा सकता , अगर कोई करे तो ये एकदम अपोजिट करेंगे . अब जैसे टेड को ही ले लो जो एक रेबेल है . वो अपने दो फ्रेंड्स के साथ एक अपार्टमेन्ट शेयर करता है . एक दिन उसके फ्रेंड्स ने पुछा ” क्या तुम बर्तन धो लोगे ? ‘ लेकिन टेड को बर्तन धोने का ज़रा भी मूड नहीं था . वो उन लोगो में से है जो दूसरो के ऑर्डर पर काम करना पसंद नही करते . रेबेल्स से डील करना मुश्किल लगता है पर उनसे ट्रिक से काम निकलवाया जा सकता है . जैसे अगर पेरेंट्स अपने रेबेल बच्चो से कुछ करवाना चाहते है तो उन्हें ऑप्शन रखने होंगे ताकि उन्हें चॉइस मिल सके . रेबेल्स को कण्ट्रोल करने का यही एक तरीका है जो आपकी प्रोब्लम सोल्व कर सकता है .
2.डिफरेंट सोल्यूशन फॉर डिफरेंट पीपल ( ( Different Solutions for Different People )

जैसा कि पहले बताया जा चूका है , जो आपके लिए काम करता है वो दूसरो के लिए शायद काम ना करे . तो आपके लिए क्या टेक्नीक बेस्ट रहेगी ये जानने के लिए खुद पर ध्यान दो . हम खुद को ये बोलकर लिमिट में नहीं रख सकते कि मै ट्रेवल नहीं कर सकता या मुझे स्पाइसी खाना पसंद नहीं है क्योंकि हम अपना माइंड चेंज कर सकते है . लेकिन आपको पता चल जाए कि आप के लिए क्या जरूरी है तो आप गुड हैबिट जल्दी अडॉप्ट कर पाओगे उन्हें मेंटेन भी रख सकोगे . यहाँ कुछ फैक्टर्स है जिससे आपको कोई भी न्यू हैबिट इफेक्टिव तरीके से अडॉप्ट करने में हेल्प मिलेगी . लार्क ओर नाईट आउल : ( Lark or night owl . ये वो लोग है जो दिन के बजाए रात को ज्यादा बैटर काम करते है . और इसे चेंज करना काफी हार्ड है जब आप सबसे ज्यादा प्रोडक्टिव होते है , क्योंकि इसमें जींस और एज का इम्पोर्टेट रोल होता है . ज्यादातर कॉलेज स्टूडेंट्स नाईट आउल होते है जबकि बड़ी उम्र के लोग लार्क्स होते है . यानी इनके दिन की शुरुवात जल्दी हो जाती है . अगर आप एक नाईट आउल है तो आपको सुबह जल्दी उठकर पढने की हैबिट डालनी चाहिए . और अगर आप लार्क है तो आपको अपने प्रोजेक्ट्स रात के 10 बजे तक फिनिश नहीं करना चाहिए . मैराथोनर , स्प्रिंटर , या प्रोक्रास्टीनेटर : ( Marathoner , sprinter , or procrastinator . अपनी हैबिट स्ट्रेटेज़ी बनाने ये जानना ज़रूरी है कि किस कोम्फेर्टबल पेस के साथ आप कोई हैबिट्स अडॉप्ट कर सकते हो।

जैसे इस बुक के ऑथर , ग्रेटचेन ( Gretchen , ) को स्लो और स्टेडी पेस के साथ काम करना पंसद है . अगर आप कोई प्रोजेक्ट फिनिश करने में लंबा टाइम लेते हो तो आप एक मैराथोनर हो . लेकीन अगर आप अंडर प्रेशर बैटर परफोर्म करते और कोई काम तभी शुरू करते हो जब डेडलाइन पास हो तो आप एक स्प्रिंटर हो . एक स्प्रिंटर शोर्ट पीरियड के प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा फोकस करना पसंद करता है . कैरोल एक ऐसी ही स्प्रिंटर है जिसे ऑडियंस के आगे एक स्पीच देनी थी . और उसने अपनी स्पीच उस टाइम रेडी करनी शुरू की जब लोग रूम में आकर अपनी सीट्स पर बैठने लगे थे . अंडर प्रेशर होने के बावजूद कैरोल ने काफी बढ़िया स्पीच तैयार कर ली थी . प्रोक्रास्टीनेटर्स स्प्रिंटर्स की तरह होते है . ये लोग भी डेडलाइन से पहले कोई काम नहीं करते . फर्क बस इतना है कि अगर काम टाइम से पूरा ना हो तो प्रोक्रास्टीनेटर्स फ्रस्ट्रेट हो जाते है . अंडर बायर ओर ओवर बायर : ( Under buyer or over buyer . जी हाँ जो आपने सुना इसका मतलब वही है . अगर आप एक अंडर बायर हो तो आप जल्दी पैसा खर्च करने वालो में से नहीं हो . जैसे कि आप रीजन दोगे कि अभी आपको न्यू रनिंग शूज़ की जरूरत नहीं है . लेकिन जो ओवर बायर होते है उन्हें शोपिंग का बहाना चाहिये होता है जैसे कोई नया महंगा ट्रेकर देखकर ये बोलेंगे ” ये मुझे चाहिए , इससे मुझे स्टेप्स काउंट करने में हेल्प मिलेगी . बात जब हैबिट्स की हो तो अंडर बायर्स को ध्यान रखना चाहिए कि कुछ चीजों पर पैसे खर्च किये जा सकते है जो एक सही इन्वेस्टमेंट हो सकता है और ओवर बायर्स को समझना चाहिए कि गुड हैबिट्स अडॉप्ट करने के लिए हमे किसी इक्विपमेंट की नहीं बल्कि पक्के इरादे की जरूरत होती है .
3.पिलर्स ऑफ़ हैबिट्स ( Pillars of Habits )

न्यू हैबिट्स अडॉप्ट करने के लिए और ओल्ड हैबिट्स को चेंज करने के लिए चार क्रूशियल स्ट्रेटेजीस है . ये है मोनिटरिंग , फाउंडेशन म शेड्यूलिंग और अकाउंटेबिलिटी . हालाँकि ये सुनने में सिंपल लगते है पर कोई भी नई हैबिट फॉर्म करने के लिए काफी इम्पोर्टेट है . फिर से हम याद दिला दे कि इन स्ट्रेटेज़ीस में इंडीविजुअल डिफ़रेंस भी काफी मैटर करता है . अब जैसे कि शेड्यूल्स रेबेल्स टाइप के लोगो पर काम नहीं करते जबकि अकाउंटेबिलिटी ओब्लिगेर्स पर सही फिट होती है . मोनिटरिंग की स्ट्रेटेज़ी तभी इफेक्टिव है जब आपको क्लियर हो कि कब किस एक्शन को मोनिटर करना है . लेकिन जहाँ किसी चीज़ को लेकर आपका इरादे पक्के नहीं है , वहां ये स्ट्रेटेज़ी काम नहीं आएगी . जैसे कि आपने सोचा कि आप अपनी नॉलेज इम्प्रूव करेंगे . हालाँकि कई बार हम चीजों को अंडर या ओवर एस्टीमेट कर लेते है लेकिन सही मेजर करना बहुत जरूरी है . जैसे एक्जाम्पल के लिए एक स्टडी में पाया गया कि हम अपने खाने को अंडरएस्टीमेट करते है और बात जब एक्सरसाइज की हो तो उसे ओवर एस्टीमेट करते है . इस स्टडी में पार्टीसिपेंट को बोला गया कि उन्हें चार मील चलना है जबकि रियेलिटी में सब सिर्फ दो मील ही चले।

अगर आप मोनिटरिंग के श्रू वेट लूज़ करना चाहते हो तो आपको पहले एक स्पेशिफिक बॉडी वेट का गोल सेट करना होगा और उस गोल को अचीव करने की एक डेट भी डिसाइड करनी होगी . एक्जाम्पल के लिए आप बोल सकते हो कि मुझे तीन महीने में 20 पाउंड वेट लूज़ करना है . बस , अब इसके बाद आपको रोज़ अपनी प्रोग्रेस चेक करनी है . स्ट्रेटेज़ी ऑफ़ फाउंडेशन का मतलब है एक टाइम में एक हैबिट टैकल करना . अक्सर ये देखा गया है कि जब एक गुड हैबिट्स बनती है तो बाकी हैबिट्स भी खुद इम्प्रूव हो जाती है . जैसे कि आपकी एक्सरसाइज की हैबिट्स से आपकी हेल्थ रिलेटेड और वर्क रिलेटेड बिहेवियर्स भी इम्प्रूव हो सकते है . लोग जो एक कॉमन मिस्टेक करते है , वो ये कि हम अपनी मोस्ट प्रोब्लमेटिक हैबिट्स को सबसे पहले टैकल नहीं करते . इसका एक एक्जाम्पल लेते है . मान लो कोई हेवी ड्रिंकर है जो अपने ऑफिस लेट पहुँचता है , हमेशा थका हुआ लगता है और सड़को पर थूकता रहता है . बजाए अपनी मेन प्रोब्लम पर फोकस करने के जोकि ड्रिंकिंग है , वो इंसान सड़को में ना थूकने का प्रोमिस करता है , जोकि उसके लिए शराब छोड़ने से ज्यादा ईज़ी होगा . इसलिए अपनी फाउन्डेशन को स्ट्रोंग बनाने के लिए ऐसी हैबिट्स डालो जो आपकी बाकि हैबिट्स भी सुधार दे . शेड्यूलिंग की स्ट्रेटेज़ी का मतलब है कि एक टाइम सेट करना जब आप हैबिट की प्रेक्टिस करोगे।

ये स्ट्रेटेजी आपको बहुत जल्दी अपनी हैबिट की आदत डलवा देगी क्योंकि ये रीपीट होती रहेगी . इससे आपको ये भी पता चलेगा कि एक दिन में हमे कितना कम टाइम मिलता है . इसलिए ऐसी हैबिट डाली जाए जो प्रोडक्टिव हो . जैसे कि सुबह 5 बजे उठकर आप मेडिटेशन करना चाहते हो तो ये टाइम आप सिर्फ मेडीटेशन के लिए रखो . लास्ट में स्ट्रेटेज़ी ऑफ़ अकाउंटेबिलिटी की बात करते है जिसमे दूसरो की हेल्प भी इन्वोल्व होती है . क्योंकि ये लोग आपको आउटर एक्सपेक्टेशन देंगे . जब तक आप किसी नई हैबिट के लिए अकाउंटेबल फील नहीं करते तब तक आप उस हैबिट्स को अडॉप्ट नहीं कर सकते , क्योंकि आपको पता है कि कोई फर्क नहीं पड़ने वाला . स्ट्रेटेज़ी ऑफ़ मोनिटरिंग के लिए ऑथर अपना ही एक्जाम्पल देते है . ग्रेटचेन हमेशा अपने वेट को लेकर कांशस रहे थे . बड़ी मुश्किल से वो अपने साइज़ को लेकर कम्फर्टबल हो पाई . अब क्योंकि वेट उनके लिए एक इम्पोर्टेट फैक्टर था , तो उन्होने डाईट और एक्सरसाइज की न्यू हैबिट्स डेवलप की जिससे उन्हें वेट लूज़ करने में हेल्प मिली . वो क्या खाती है और कितना वेट लूज़ करती है , इसे मोनिटर करने के लिए ग्रेटचेन ने एक फूड जर्नल रखा था . पर कुछ टाइम बाद ही वो भूल गयी कि अपने खाने – पीने का रिकॉर्ड रोज़ लिखना है . फिर उन्होंने एक पेडोमीटर गज करना स्टार्ट किया जिससे उन्हें पता चलता था कि एक दिन में वो कितने स्टेप्स चली है।

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क्योंकि ग्रेटचेन एक अपहोल्डर थी , तो उन्हें अपने टारगेट स्टेप्स हिट करना अच्छा लगता था . हालाँकि ये मेथड भी ज्यादा काम नहीं आया . फिर उन्होंने एक डिवाइस खरीदा जो उनके स्टेप्स उनके फोन के साथ सिंक करता था और जो वो दिन भर में खाती थी उसका भी रिकॉर्ड रखता था . तो फाईनली अपने फ़ोन में स्टेप और फूड ट्रेकर होने से ग्रेटचेन के लिए अब वेट मोनिटर करना ज्यादा ईज़ी था . स्ट्रेटेज़ी ऑफ़ फाउंडेशन के लिए फाउंडेशन हैबिट्स है स्लीप , मूव , ईट और अनकल्टर . मूविंग एक फाउंडेशन हैबिट है क्योंकि एक्सरसाइज़ के बाद आप गहरी नींद सो जाते हो . और जब आपको अच्छी और भरपूर नींद मिलती है तो आपका मूड भी बढ़िया रहता है . असल में नींद पूरी होने से हम और ज्यादा गुड हैबिट्स अडॉप्ट कर सकते है . जब आप जल्दी सोते हो तो आपके पास इतना टाइम होता कि मुंह धोकर नाईट पैजामा पहन सको . लेकिन जब आप लेट सोते हो तो आपके पास इन चीजों के लिए टाइम नहीं होता . ग्रेटचेन ने स्ट्रेटेज़ी ऑफ़ शेड्यूलिंग भी ट्राई की . मेडीटेशन की हैबिट अडॉप्ट करने के लिए ग्रेटचेन ने स्ट्रेटेज़ी ऑफ़ फाउंडेशन के साथ उसे जोड़ दिया . क्योंकि अक्सर हम न्यू हैबिट्स जल्दी भूल जाते है इसलिए उन्होंने मेडीटेशन को अपनी ओल्ड हैबिट के साथ जोड़ दिया . ग्रेटचेन ने डिसाइड किया कि वो सुबह जल्दी ब्रेकफास्ट करने के बाद मेडिटेशन किया करेगी।

फिर उन्होंने एक मेडीटेशन शेड्यूल बनाया . उसके बाद वो अपनी न्यू हैबिट की प्रेक्टिस नहीं भूली , और धीरे – धीरे ये न्यू हैबिट उनके रूटीन का एक पार्ट बन गयी . क्योंकि सिर्फ शेड्यूलिंग काफी नहीं है , इसलिए अकाउंटेबिलिटी के लिए दूसरों से आउटर एक्सपेक्टेशन भी जरूरी है . जैसे कि कुछ पाउंड वेट लूज़ करना एक पर्सनल गोल हो सकता है , और अगर आप ये गोल अचीव ना भी कर पाए तो कोई आपको पनिश नहीं करने वाला . पर स्ट्रेटेज़ी ऑफ़ अकाउंटेबिलिटी अप्लाई करने से आप अपने को – वर्कर्स को अपने वेट लूज़ करने का प्लान बता सकते हो . और लोग आपको एक्सरसाइज करने के लिए एंकरेज करेंगे क्योंकि उन्हें आपका गोल पता है . हो सकता है कि वो आपको जंक फूड खाने से भी रोके . लेकिन ये फार्मूला हर किसी पर अप्लाई नहीं होता क्योंकि हर कोई अपने प्लान्स शेयर , करे ये जरूरी नहीं . तो अपनी न्यू हैबिट को पब्लिकली डिक्लेयर करना आपके काम आएगा या नहीं , ये देखने से पहले आपको अपना नेचर पता होना चाहिए।
4.इट इज़ इनफ टू बिगेन ( It’s Enough to Begin )

अगर आपको पता चल जाए कि आपकी टेंडेसी क्या है- अपहोल्डर , क्वेशचनर , ओब्लिगर या रेबेल -तो आपको ये भी समझ आ जायेगा कि कौन सी टेक्नीक आपके लिए बेस्ट रहेगी . अब हम बात करेंगे कि आपको अपनी न्यू हैबिट्स कब से स्टार्ट करनी चाहिए . किसी भी न्यू हैबिट की शुरुवात करने के लिए तीन स्ट्रेटेज़ीस होती है , फर्स्ट स्टेप्स , क्लीन स्लेट और लाईटनिंग बोल्ट . जैसा कि इस चैप्टर का टाईटल है ” इट्स नोट इनफ टू गेट स्टार्टेड ” . आपको फर्स्ट स्टेप लेना होगा . एक नई हैबिट स्टार्ट करने में थोड़ी मुश्किलें तो आती है जैसे कि अचानक से जिम जाना शुरू करना . क्योंकि ये आपकी रूटीन का ऑटोमेटिक प्रोसेस अभी नहीं बना तो आपको जिम के लिए प्रॉपर रेडी होकर जाना शायद वर्कआउट करने से भी ज्यादा हार्ड लगे . एक्साईटमेंट में आकर न्यू हैबिट प्लान कर लेना एक बात है पर उसको प्रेक्टिकल में लाना एकदम अलग चीज़ है . न्यू हैबिट फॉर्म करने की एक और स्ट्रेटेज़ी है जिसे क्लीन स्लेट स्ट्रेटेजी बोलते है . ये तब होता है जब आपकी लाइफ में कोई सिग्नीफिकेंट चेंज आता है।

जैसे कि कोई नया पार्टनर , एक नया घर या नई जॉब . लोग अक्सर न्यू इयर रेजोल्यूशन के तौर पर हेल्दी खाना स्टार्ट कर देते है तो ये एक क्लीन स्लेट स्ट्रेटेज़ी मानी जायेगी क्योंकि न्यू इयर नई शुरुवात लेकर आता है . इसे हम नए साल का जादू ही मानेंगे क्योंकि कई लोग नए शुरुवात में काफी मोटिवेट फील करते है और अपनी न्यू हैबिट्स पर स्टिक रहते है . हालाँकि एक नई हैबिट अडॉप्ट करने का मतलब है सेम चीज़ रीपीट करना . और कुछ हैबिट्स हमारी लाइफ में ईजिली अप्लाई हो जाती है . ये हैबिट्स लाईटनिंग बोल्ट स्ट्रेटेजी के श्रू अडॉप्ट की जा सकती है . इन्हें हम ओन डिमांड के तौर पर यूज़ कर सकते है क्योंकि ये हमारी लाइफ के टर्निंग पॉइंट होते है जैसे कि कोई बड़ा लोस या कोई ग्रेट फेलर . यहाँ पर फर्स्ट स्टेप टर्म जो ऑथर ने यूज़ किया है उसका मतलब है किसी न्यू हैबिट की शुरुवात।

ग्रेटचेन ने जब इस बुक को लिखना स्टार्ट किया तो वो फर्स्ट स्टेप्स की स्ट्रेटेज़ी अप्लाई कर रही थी . बुक के लिए आईडियाज़ लेना और स्ट्रक्चर प्लान करना उसके लिए काफी मजेदार और एक्साईटिंग रहा लेकिन जब असल में लिखने की बारी आई तो ग्रेटचेन अटक गयी . वो डिसाइड नहीं कर पा रही थी कि बुक लिखना कब से शुरू करे ? कौन सी तारीख या दिन सही रहेगा ? मंडे से करे या अपने बर्थडे वाले दिन से ? इससे पहले कि वो आगे सोचती , ग्रेटचेन को रिएलाइज हुआ कि वो ” टुमारो ” लोजिक यूज़ कर रही है . यानी आज का काम कल पे टालना . और उसने डिसाइड कर लिया कि उसे बुक लिखने के लिए तुरंत फर्स्ट स्टेप लेना होगा . यहाँ हम क्लीन स्लेट स्ट्रेटेज़ी का एक्जाम्पल देते है . लिंडा 40 साल की है और उसके पति की डेथ हो चुकी है . उसे डर था कि कहीं उसका अकेलापन उसे डिप्रेशन में ना डाल दे।

उसे रिएलाइज हुआ कि उसे घर से निकल कर लोगो से मिलना – जुलना चाहिए . उसने अपने क्लोज फ्रेंड्स को कांटेक्ट करके उनके साथ कुछ फन एक्टिविटीज़ प्लान की . और कुछ टाइम बाद ही लिंडा पहले जैसी खुश रहने लगी . वो रेगुलर अपने फ्रेंड्स से मिलती है , उनके साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करने से उसका मूड अच्छा रहता है . जैसा कि हमने पहले बताया लाईटनिंग बोल्ट स्ट्रेटेजी कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो आप जबरदस्ती अप्लाई करो . अक्सर हमारी लाइफ के कुछ माइलस्टोन एक्सपीरिएंश में ये स्ट्रेटेज़ी अप्लाई होती है।

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शेरील एक डॉक्टर है . उनके कई सारे पेशेंट्स पर लाईटनिंग बोल्ट स्ट्रेटेज़ी बड़े काम आई है . खासकर वो पेशेंट्स जिन्हें ड्रग्स , निकोटीन और एल्कोहल एडिक्शन की प्रोब्लम थी . लेकिन कभी कोई ऐसी चीज़ होती है जो इन्सान को एक ही दिन में बदल कर रख देती है . उसके साथ कुछ ऐसा होता है कि वो अपनी सारी बेड हैबिट्स छोड़ देता है . इसे ही हम लाईटनिंग बोल्ट इफेक्ट बोलते है . शेरील कहती है कि इनमे से एक रीजन प्रेगनेंसी भी है . जैसे कि कुछ औरते अपनी प्रेगनेंसी का पता चलते ही अपनी सारी बेड हैबिट्स छोड़ देती है . क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनके साथ एक और लाइफ जुडी है जिसकी केयर और प्रोटेक्शन सिर्फ उनके हाथ में है . यहाँ पर हम बोल सकते है कि प्रेगनेंसी उनकी लाइफ का वो माइलस्टोन है जो लाईटनिंग बोल्ट स्ट्रेटेज़ी का रीजन है।
कनक्ल्यूजन ( Conclusion )

कई बार हमे ये सोचकर फ्रस्ट्रेशन होती है कि जो चीज़ दूसरो पर काम करती है वो हम पर क्यों नहीं करती . इंडीविजुवल डिफ़रेंसेस से डील करना थोडा मुश्किल हो सकता है . लेकिन अगर आपको पता चल जाए कि आप अपहोल्डर हो या क्वेश्चनर , ओब्लीगर , या रेबेल तो फिर आप उसी हिसाब से ऐसी टेक्निक्स अप्लाई कर सकते हो जिससे आपके लिए हैबिट मेंटेन करना बेहद ईजी हो जायेगा . आप किस टाइप के है , ये जानने के अलावा आप इस बुक में दी गयी स्ट्रेटेज़ीस यूज़ करने की पॉवर के बारे में सीखेंगे जो आपको गुड हैबिट्स मेंटेन करने में हेल्प करती है . ये स्ट्रेटेजीस है मोनीटरिंग , फाउंडेशन , शेड्यूलिंग और अकाउंटेबिलिटी . लास्ट में इस बुक में ऑथर ने न्यू हैबिट्स स्टार्ट करने के लिए डिफरेंट टाइम्स भी मेंशन किये है जैसे फर्स्ट स्टेप्स , क्लीन स्लेट और लाइटनिंग बोल्ट . हो सकता है कि इस बुक को पूरी पढने के बाद भी आपको नई हैबिट्स डालने और मेंटेन करने में प्रोब्लम हो तो भी कोई टेंशन नहीं . न्यू हैबिट्स डेवलप करने में कुछ वक्त लगेगा है और कुछ गलतियाँ भी जरूर होंगी . आपके लिए कौन सी स्ट्रेटेजी काम करेगी , ये जानने के लिए काफी सेल्फ एक्सप्लोरिंग करनी पड़ेगी . गुड हैबिट्स के लिए शोर्ट कट्स काम नहीं आते बल्कि ये एक मुश्किल जर्नी है लेकिन जो रिजल्ट आपको मिलेगा उसके सामने ये मेहनत कुछ भी नहीं है।

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