ऐसे करे पॉजिटिव माइंडसेट डेवलप | Battlefield Of The Mind Book summary

Battlefield Of The Mind Book summary In Hindi-

क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे मन में बुरे और डराने वाले विचार कहाँ से आते हैं? ऐसा क्या है या कौन है जो आपके मन को बेचैन कर देता है? आपको ये जानकर हैरानी होगी कि ये सब आपके ख़ुद की वजह से नहीं होता है. जब ये बुरी भावनाएं आपको घेर लेती हैं तो आप किस चीज़ का सहारा लेते हैं या ख़ुद को कैसे संभालते हैं? 

ऐसे करे पॉजिटिव माइंडसेट डेवलप | Battlefield Of The Mind Book summary

इस बुक में आप जानेंगे कि कैसे शैतान आपके माइंड में आपसे एक जंग लड़ रहा है. क्या आप जानते हैं कि हमारे थॉट्स कितने पावरफुल होते हैं? शैतान तो ये बात बहुत अच्छे से जानता है और इसलिए वो हर रोज़ आपके दिमाग में घुसने की और उस पर हमला करने की कोशिश करता है.

आपको ये भी पता चलेगा कि शैतान ऐसा कैसे करता है और उससे लड़ने के लिए आप क्या कर सकते हैं. 
आप ये भी जानेंगे कि इन सब में भगवान् का क्या रोल है, आपको उनके रहस्मयी तरीकों के बारे में पता चलेगा. इस बुक के ख़त्म होते-होते आपके पास उस शैतान को हराने के हथियार होंगे और आप उसके साथ आधी जंग भी जीत चुके होंगे. तो आइए बिना देर किए जंग के मैदान में चलते हैं. 

The Mind is the Battlefield (मन युद्ध का मैदान है)

इस बुक की ऑथर जॉयस जब बाइबिल पढ़ रही थीं तो उन्होंने कुछ महसूस किया. बाइबिल में भगवान् के शब्दों में कई बातें ऐसी लिखी हुई थीं जो इंसान के माइंड के पॉवर के बारे में बताती हैं. इसका एक एग्ज़ाम्पल है, Proverb 23:7. बाइबिल के किंग जेम्स के version में ये कहा गया है कि एक आदमी अपने दिल में जो सोचता है, वो वैसा ही बन जाता है.
 
हमारे विचार हमारे एक्शन को कंट्रोल करते हैं. नेगेटिव माइंडसेट होने से नेगेटिव जीवन ही मिलेगा. लेकिन भगवान् पर ध्यान फोकस करना हमें पॉजिटिव माइंडसेट देगा. पॉजिटिव माइंड के ज़रिए हम उस रास्ते को देखना शुरू कर देंगे जो भगवान् ने हमारे लिए बनाया है और उस पर चलने लगेंगे।

इफिसियों 6:12 का शास्त्र कहता है कि असल में हर इंसान एक जंग लड़ रहा है. अब ये कोई  आम जंग नहीं है जहां खून बहाए जाते हैं, बम गिराए जाते हैं. बाइबिल में जिस जंग का ज़िक्र किया गया है, वो शैतान और उसकी सेना के साथ हमारी स्पिरिचुअल यानी आध्यात्मिक जंग है. शैतान अक्सर हमें धोखा देने की कोशिश करता है. वो हर उस चीज़ को दिखाता है जो झूठी है. शैतान कभी हमसे तुरंत झूठ नहीं बोलता, वो अपना समय लेता है क्योंकि आपको कमज़ोर करने के लिए वो एक शानदार प्लान बना रहा होता है।

शैतान धीरे-धीरे हमारे मन में डाउट, डर, शक जैसे बीज बोने लगता है. शुरुआत में हमें इसका एहसास नहीं होता लेकिन बाद में ये हमें अपनी गिरफ़्त में लेने लगता है, हमें चारों ओर से घेरने लगता है. शैतान में बहुत पेशेंस होता है. वो हमारे मन में जैसे एक किला बना लेता है और भगवान् के बारे में जो हमारा विश्वास और विचार है उसे झूठा साबित करने में लग जाता है।

इस किले का मकसद है हमें हराना. ये किला ऐसा एरिया है जिसमें हम अपने गलत विचारों द्वारा कैद हो जाते हैं. ये सब हमारे माइंड में चलता रहता है. मन इसके जंग का मैदान बन जाता है. आइए इसे एक कहानी से समझते हैं जहां आप देख पाएँगे कि मार्था और जौश के दुखी शादीशुदा जिंदगी में मन की लड़ाई कैसे होती है।

मार्था जौश से ख़ुश नहीं थी. वो दोनों हमेशा झगड़ते रहते और एक दूसरे को कड़वी बातें सुनाते रहते. यहाँ तक कि उनके दो बच्चे भी इस नफ़रत और तनाव को महसूस करने लगे थे. मार्था जौश को घर का हेड नहीं बनने देना चाहती थी. वो अपनी ख़ुद की चलाने वाली इंडिपेंडेंट औरत थी. वो सोचती थी कि हमेशा हर फ़ैसला लेने का अधिकार सिर्फ़ उसके पास होना चाहिए।

अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसी हालत में मार्था को भगवान् की शरण में जाना चाहिए. भगवान् इस यात्रा में उसकी मदद करेंगे. लेकिन बात ये है कि मार्था भगवान् पर विश्वास तो करती थी. वो ये भी जानती थी कि उसमें ऐंठ है और उसका रवैया ख़राब है लेकिन वो ये नहीं जानती थी कि उसे बदलना या ठीक कैसे करना है. वो इस तरह रियेक्ट इसलिए करती थी क्योंकि वो रियेक्ट करने का और कोई तरीका जानती ही नहीं थी. 
  
यहाँ प्रॉब्लम ये है कि मार्था के मन में एक किला बना हुआ था जो जौश से मिलने से बहुत समय पहले ही बन गया था. बचपन से ही शैतान इस किले को मार्था के मन में मज़बूत करता जा रहा था. क्या लगता है आपको इसका क्या कारण हो सकता है? कारण ये था कि मार्था का बचपन बहुत दर्दनाक था. जब भी उसके पिता का मूड ख़राब होता तो वो उसे बुरी तरह मारते, उसे तकलीफ़ पहुंचाते. मार्था और उसकी माँ ने इस बुरे व्यवहार को कई सालों तक सहा.
 
अब जैसे-जैसे मार्था बड़ी होने लगी, शैतान का उस पर असर होने लगा. उसके मन में अब आदमियों के खिलाफ़ एक मज़बूत किला बनकर तैयार हो गया था. मार्था के मन में ये बात बैठ गई कि आदमी बेईमान होते हैं और भरोसा करने के लायक नहीं होते. उसे लगने लगा कि आदमी हमेशा उसका गलत फ़ायदा उठाएंगे।

इसलिए मार्था ने ठान ली कि अब कोई उसके साथ बुरा व्यवहार नहीं कर सकता, उसे हुक्म नहीं दे सकता कि उसे क्या करना है कैसे करना है, ख़ासकर आदमी तो बिलकुल नहीं. 
अब उसके मन में शैतान ने जो किला बनाया था उसे तोड़ने के लिए मार्था क्या कर सकती है? उसके पास एक ही हथियार है, भगवान् की कही हुई बातों को फॉलो करना. लेकिन सिर्फ़ बाइबिल पढ़ना या सुनना काफ़ी नहीं है. मार्था को बार-बार भगवान् की कही हुई बातों को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना होगा।

और भी स्पिरिचुअल हथियार हैं जिनका हम इस्तेमाल कर सकते हैं वो है स्तुति और प्रार्थना. जितना ज़्यादा आप भगवान् की सेवा करेंगे, उनके गुण गाएंगे और उनकी कही हुई बातों को फॉलो करेंगे उतना ही ज़्यादा आप अपने विचारों और शब्दों के इम्पोर्टेंस को जान पाएँगे. इन बातों को फॉलो करने से आप जानेंगे कि वो पवित्र आत्मा हमेशा आपको गाइड कर सही रास्ता दिखाने के लिए तैयार रहती है. इंसान शरीर के मन की बातों पर ध्यान लगाता है लेकिन spirituality हमें आत्मा की बातों पर मन लगाना सिखाती है. 
   
आपकी सेवा या स्तुति ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसे आप सिर्फ़ करने के लिए कर रहे हैं, बेमन से. आपको इसे पूरे मन से, सच्चे दिल से करना है. प्रार्थना का मतलब होता है मांगना, भगवान् से बात करना. ये उनसे मदद मांगना भी है और उनके साथ एक गहरा रिश्ता जोड़ना भी।

प्रार्थना के ज़रिए हम भगवान् से जुड़ते हैं. ये जुड़ाव हमें सच की ओर ले जाता है और सच हमें हर बंधन, हर झूठ से आज़ाद कर देता है. इन्हीं हथियारों के द्वारा मार्था अपने मन में बने किले को तोड़ पाएगी. तब जाकर वो ये सच्चाई जान पाएगी कि हर आदमी उसके पिता की तरह नहीं होता और उसका पति तो बिलकुल उसके पिता की तरह नहीं था।

A Vital Necessity(एक महत्वपूर्ण आवश्यकता)

हमारे विचारों में बहुत शक्ति होती है. इसलिए हमें बहुत सावधान रहना चाहिए कि हम अपने मन में किस तरह के विचार रखते हैं. तो सोचने का सही तरीका क्या है? सही तरीका है जब हमारी सोच भगवान् की कही हुई बातों के समान हो जाती है या उनसे मेल खाने लगती है.

ऑथर इस बात पर ज़ोर देकर कहती हैं कि अगर आपका माइंड नेगेटिव है तो आप कभी एक पॉजिटिव जिंदगी नहीं जी सकतेRomans 8:5 दो अलग-अलग माइंड के बारे में बताते हैं – पहला जो हमारे शरीर का दिमाग होता है और दूसरा जो हमारी आत्मा का दिमाग होता है. शरीर का दिमाग उन विचारों के बारे में बताता है जो गलत हैं. ये उन नेगेटिव विचारों के बारे में बताता है जो हमारे मन में आते हैं.

उसे इसलिए मांस का दिमाग कहा जाता है क्योंकि हम अपने लिए बुरी और अपवित्र चीज़ें करते हैं.  हम अपने शरीर की इच्छाओं को पूरा करने लगते हैं भले ही वो भगवान् की कही हुई बातों के खिलाफ़ ही क्यों ना जाता हो. ये मांस का दिमाग हमें पॉजिटिव जीवन जीने से रोक देता है. जबकि आत्मा के दिमाग की सुनना ज़्यादा ज़रूरी है क्योंकि ये भगवान् की तरह सोचने जैसा है जिससे पवित्र आत्मा संतुष्ट हो जाती है. 

मान लीजिए कि आपको अपने बैंक से कॉल आता है कि आपने अपने अकाउंट से 850$ ज़्यादा निकाल लिए हैं. इसे सुनकर आप बहुत हैरान और शर्मिंदा हो जाते हैं. आपको याद आता है कि शायद इस महीने आप अपने अकाउंट में पैसे जमा करना भूल गए. आप जल्दी से बैंक पहुंचकर पैसे जमा करते हैं. इस मुद्दे को तुरंत हल करने से आगे और मुश्किलें खड़ी नहीं होंगी 

इसी तरह ऑथर सलाह देती हैं कि आप अपने मन को भी नया बनाएं. अगर आप सालों से गलत ढ़ंग से सोच रहे हैं तो आपका जीवन unorganized बनकर रह जाएगा. एक बात हमेशा याद रखें कि आपका जीवन तब तक आर्गनाइज्ड नहीं बन सकता जब तक आपका मन आर्गनाइज्ड नहीं बनेगा. शैतान ने आपके मन में जो किला बना लिया है उसे तोड़ने के लिए आपको सीरियस होना पड़ेगा.आपको  भगवान् की बताई हुई बातें, उनकी स्तुति और प्रार्थना के हथियारों का इस्तेमाल कर किले को तोड़ना होगा. 
अपने मन को पॉजिटिव बनाने के लिए भगवान् से मदद मांगें. पवित्र आत्मा आपकी मदद करेगी, उन पर विश्वास करें. आप अकेले शैतान को नहीं हरा सकते और इसलिए भगवान् में विश्वास करने के लिए सही सोचना बहुत ज़रूरी है

ये बिलकुल जिंदा रहने के लिए दिल की धड़कन जितना ज़रूरी है. जिस तरह आपके फिजिकल शरीर को जीने के लिए खाने की ज़रुरत होती है उसी तरह आपके स्पिरिचुअल जीवन को भी पोषण की ज़रुरत होती है और ये हम हर रोज़ कुछ समय भगवान् के साथ बिताकर हासिल करते हैं. 

बाइबिल कहती है कि एक पेड़ अपने फलों से ही जाना जाता है. हमारे जीवन का भी यही सच है. विचारों में फल लगते हैं. अच्छे विचार हमारी जिंदगी में अच्छे फल लाते हैं और बुरे विचार बुरे. एक अच्छा इंसान कभी दूसरों के बारे में बुरा नहीं सोचता उसी तरह एक दुष्ट इंसान के विचार कभी अच्छे नहीं होते. 

बाइबिल

आपका दिमाग कब सामान्य है?

भगवान् में विश्वास करने वाले के माइंड की क्या स्टेट होनी चाहिए? इस सवाल में गोता  लगाने से पहले आपको इस प्रिंसिप्ल के बारे में पता होना चाहिए कि मन आत्मा की मदद करता है. जब कोई इंसान भगवान् का अपने जीवन में स्वागत करता है तो पवित्र आत्मा उस इंसान में रहना शुरू कर देती है. बाइबिल के अनुसार ये पवित्र आत्मा भगवान् के मन में भी बसती है.

इसलिए आत्मा हमें भगवान् के ज्ञान को पाने में मदद करती है. ये आत्मा हम सब से और भगवान् के साथ जुड़ी हुई है. जब आत्मा हमें भगवान् का ज्ञान देती है तो हमें सच्चाई का पता चलता है 
हालांकि आत्मा हमें ज्ञान देना चाहती है लेकिन वो हमेशा कामयाब नहीं हो पाती. इसका कारण है कि हम इतने बिजी हो गए हैं कि हमारा मन उन बातों पर ध्यान ही नहीं देता या उसे याद नहीं रखता जो आत्मा हमें बताती है. एक मन जो हमेशा बिजी रहता है वो abnormal मन होता है.

एक नार्मल माइंड तब होता है जब वो आत्मा की बातों को सुनता है. ऐसा मन शांत और रिलैक्स होता है. एक नार्मल मन के अंदर डर, चिंता या बेचैनी जैसी नेगेटिव भावनाएं नहीं होतीं.
 

जॉयस ने अपने जीवन में हमेशा भगवान् से ज्ञान माँगा है. लेकिन वो ये समझ ही नहीं पाई कि उसके अंदर जो आत्मा बैठी है वो तो उसे कब से वही दे रही है जो वो भगवान् से मांग रही थीं. वो अपने आत्मा की आवाज़ इसलिए नहीं सुन पाई क्योंकि उनका मन इतना बिजी था, वहाँ इतनी उथल पुथल मची हुई थी. 
मान लीजिए कि एक कमरे में दो लोग हैं.

पहला आदमी दूसरे के कान में कुछ फुसफुसाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन दूसरा आदमी इसे सुन नहीं पा रहा क्योंकि कमरे में बहुत शोर हो रहा था. बिलकुल ऐसा ही होता है जब आत्मा और परमात्मा हमसे बात करने की कोशिश करते हैं. आत्मा बहुत कोमल होती है उसकी आवाज़ धीमी होती है. इसलिए हमें अपने मन को जितना संभव हो सके उतना शांत बनाना चाहिए ताकि हम ये सुन सकें कि आत्मा हमसे क्या कहना चाहती है. 

शैतान जानता है कि आपका मन और आत्मा साथ मिलकर काम कर रहे हैं. वो इस पर रोक लगाने के लिए आपके मन में एक जंग छेड़ देता है. वो आपके मन में लगातार डर और चिंता के बीज बोता जाता है. आप जितना अपने विचारों के बारे में सोचते हैं, आपका मन उतना ही थकने लगता है. इस थकान की वजह से वो आत्मा की धीमी आवाज़ को सुन ही नहीं पाता. इसलिए नार्मल माइंड वो होता है जिसमें शांति है और जो थका हुआ नहीं है. 

The Mind of Christ (मसीह का मन)

अब आपको ये कैसे पता चलेगा कि आपके विचार सही हैं या नहीं? ये चैप्टर हमें बताएगी कि जब Jesus  धरती पर थे तो वो कैसे सोचते थे. Jesus के विचारों पर एक नज़र डालने से आपके लिए उनके नक्शे क़दम पर चलना आसान हो जाएगा.

आप सोच रहे होंगे कि ये तो नामुमकिन है, Jesus  की तरह सोचना तो बिलकुल संभव नहीं है. वो तो परफेक्ट थे. लेकिन भगवान् ने हमें उन लाखों आर्शीवाद से भी ऊपर एक आशीर्वाद दिया है , जन्म के वक़्त हमें एक नया स्वभाव दिया गया था, ये भगवान् का स्वभाव है. बाइबिल का कहना है कि भगवान् की बातों को फॉलो करना और उनके बताए रास्ते पर चलने से हमें कई चीज़ें मिलेंगी जैसे – उनकी आत्मा, एक नया दिल, और एक नया दिमाग. अब इसका क्या मतलब है?

Romans 8:6 में कहा गया है कि मांस का मन आपको एक बुरे अंत तक ले जाता है और आत्मा का मन जीवन की ओर ले जाता है. Jesus जैसा मन बनाने के लिए जिंदगी और मौत के बीच के फ़र्क को जानना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी जीत है. मान लीजिए कि एक आदमी ने आपके साथ कुछ बुरा किया. जैसे ही आप उसके बारे में सोचते हैं आपका गुस्सा तेज़ हो जाता है. आप ख़ुद से कहते रहते हैं कि आप उस आदमी से कितनी नफ़रत करते हैं.

अगर आपका मन आत्मा का मन होगा तो आप ऐसे बुरे विचारों को मन में आने ही नहीं देंगे क्योंकि जब आप गौर से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि आप कितनी नफ़रत से भर गए हैं. इससे आप परेशान होंगे, बेचैन होंगे और आपका सिर भी दर्द कर सकता है. दूसरी और, आत्मा का मन आपको यही बताएगा कि आपको जिंदगी में कितनी चीज़ें मिली हैं, आप कितने भाग्यशाली हैं.

Jesus  जैसी सोच रखने का एक तरीका है पॉजिटिव विचार बनाए रखना. क्योंकि आपका मन बहुत पावरफुल होता है इसलिए इसे सिर्फ़ पॉजिटिव विचारों से ही भरना चाहिए. इसे आप पॉजिटिव माइंडसेट और नज़रिया बनाकर अचीव कर सकते हैं. Jesus  इसका परफेक्ट एग्ज़ाम्पल हैं. उन्होंने धरती पर अपने समय के दौरान बहुत दुःख झेला. लोगों ने उनसे झूठ बोला, उनके साथ धोखा किया और उन्हें अकेला छोड़ दिया.

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एक ऐसा भी वक़्त था जब Jesus  बिलकुल अकेले पड़ गए थे और उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा था. फ़िर भी उन्होंने पॉजिटिव नज़रिया बनाए रखा. वो हमेशा अपने आस पास के लोगों में, अपने followers में जोश और जुनून भरकर उन्हें encourage करते रहते थे. भगवान् चाहते हैं कि हम हमेशा पॉजिटिव बने रहे.

शैतान हमें दुखी करना और दबाना चाहता है. ऐसा वो नेगेटिव विचारों के साथ हमारे मन पर हमला कर के करता है. अब, आप डिप्रेशन से कैसे जूझते हैं?पहले ये जान लें कि डिप्रेशन का main कारण क्या है. संभावना है कि ये शैतान का आपके दिमाग पर हमले की निशानी है.

दूसरा, इस बात को स्वीकार करें कि डिप्रेशन हमारे अंदर से जिंदगी चूसकर हमें बेजान कर देता है और हमें एक जिंदा लाश बना देता है. ये आपमें डर भरकर आपको powerless महसूस कराता है. जितने लंबे समय तक डिप्रेशन आपके साथ रहेगा उतना ही आपके लिए इसे अपनी जिंदगी से दूर करना मुश्किल होता जाएगा.

तीसरा, अपनी जिंदगी के अच्छे समय को याद करें.अपनी जिंदगी के अच्छे पलों के बारे में सोचने से आपको उम्मीद मिलेगी. डिप्रेशन अपने साथ जो अँधेरा लेकर आता है ये उसमें बिलकुल एक  दिए कि रौशनी की तरह काम करेगा जो आपके उदास मन में उजाला फैला देगा. पॉजिटिव यादें शैतान को हराने के लिए कुछ आईडिया भी दे जाती हैं. चौथा, बुरे वक़्त में अपने स्पिरिचुअल हथियारों का इस्तेमाल करें. याद रखें कि भगवान् की प्रार्थना और स्तुति आपके हथियार हैं.

अपने हाथों को ऊपर उठाएं और भगवान् से प्रार्थना करें. ज़्यादातर लोग उदास इसलिए हो जाते हैं क्योंकि उन्हें जो चाहिए उसकी तलाश वो गलत जगहों पर करते हैं. उन्हें सिर्फ़ भगवान् की ज़रुरत है. उनसे बात करने से उन्हें रास्ता दिखाई ज़रूर देगा.  

Wilderness mentality (जंगल मानसिकता) #1

मेरा व्यवहार गलत हो सकता है, लेकिन यह मेरी गलती नहीं है.बाइबिल में बताया गया है कि इसरायिलियों पर जंगल की मानसिकता हावी हो गई थी. उन्होंने जंगल में 40 साल बिता दिए जबकि उनका सफ़र सिर्फ़ 11 दिन में ख़त्म हो जाता.

जंगल की मानसिकता का मतलब है बेकार में इधर उधर भटकना जो हमें आगे बढ़ने या प्रोग्रेस करने नहीं देता. जॉयस ने महसूस किया कि यही मानसिकता हम सभी में मौजूद है. यहाँ उनके कहने का मतलब है कि हम किसी भी सिचुएशन में इतने लंबे समय तक अटक कर रह जाते हैं कि आगे ही नहीं बढ़ पाते. हमें कुछ अचीव करने में सालों लग जाते हैं जबकि हम उसे बहुत कम समय में हासिल कर सकते थे. इस तरह की मानसिकता होना गलत है. ये हमें ख़ुद को इम्प्रूव करने से रोकती है.

दूसरी ओर, सही मानसिकता हमें बेहतर बनाती है. Colossians का एक passage हमें सिखाता है कि हमें एक परमानेंट राईट माइंडसेट रखना चाहिए. ये हमें उस रास्ते पर ले जाता है जो भगवान् ने हमारे लिए बनाया है. इस तरह की मानसिकता जो काफ़ी लोगों में कॉमन है वो है अपने एक्शन की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेना।

ये समय के शुरुआत से ही चला आ रहा है. जब भगवान् ने adam और eve से सवाल किया था कि उन्होंने वो फल क्यों खाया जिसे खाना मना था तो वो दोनों एक दूसरे को ही दोषी बताने लगे. उन्होंने शैतान को भी दोषी ठहराया. उन दोनों ने अपनी गलती नहीं मानी. जॉयस कहती हैं कि एक वक़्त था जब उनकी भी यही मानसिकता हुआ करती थी.

उन्होंने इसे ख़ुद में और अपने पति डेव में देखा था. उस वक़्त जॉयस ये प्रार्थना करती थी कि उनके पति बदल जाएं. जब उन्होंने बाइबिल पढ़ना और प्रार्थना करना शुरू किया तो उनकी आत्मा ने कहा कि उनके पति में नहीं दोष ख़ुद उनमें था. किसी को ये स्वीकार करना पसंद नहीं है कि वो गलत हैं. लेकिन जॉयस ने इस बात को हलके में नहीं लिया. तीन दिनों तक वो बहुत रोईं. भगवान् ने जॉयस को ये दिखा दिया था कि उनके साथ रहना कितना मुश्किल था.

उन्होंने ख़ुद देखा कि वो कितना कंट्रोल करती थी, कितना डिमांड करती थीं और लगभग हर चीज़ के लिए शिकायत करती रहती थीं. ये महसूस होने के बाद उन्होंने ख़ुद पर काम करना शुरू किया. अक्सर आप सेम प्रोब्लेम्स को सोल्व करने में अटके रह जाते हैं क्योंकि  आप ख़ुद को बदलने पर विचार ही नहीं करते.

आपके मन में अनगिनत “अगर, काश…..” जैसे शब्द चलते रहते हैं जिनमें आप चाहते हैं कि दूसरे बदलें लेकिन आप नहीं बदलना चाहते. आपके मन में ख़याल आता है कि अगर मेरे पेरेंट्स ने थोड़ी और मेहनत की होती तो मुझे ज़्यादा अच्छे यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिलता, अगर मेरे पति ज़्यादा supportive होते तो मैं वो जॉब कर सकती थीं, अगर मेरे पास थोड़े ज़्यादा पैसे होते तो मैं ज़्यादा सुंदर घर ख़रीद सकती थी.

देखा आपने कितने सारे अगर हैं आपके मन में. हकीकत तो ये है कि सच्चाई का सामना करना बहुत मुश्किल होता है. हमें लगता है कि हम अपनी प्रॉब्लम के सामने हार जाएँगे. भगवान् आपको बदलने में मदद कर सकते हैं. लेकिन अगर आप अपने एक्शन की ज़िम्मेदारी नहीं लेंगे तो वो ऐसा नहीं कर पाएँगे. आपको ख़ुद के साथ और उनके साथ इमानदार होना होगा. भगवान् बहुत दयालु हैं लेकिन आप क्या सही और गलत कर्म कर रहे हैं उसकी ख़ुद ज़िम्मेदारी लेना सीखें. 

Wilderness mentality (जंगल मानसिकता) #2

अगर बाकी सब मुझ से बेहतर हैं तो मुझे जलन क्यों नहीं होनी चाहिए?हम हमेशा दूसरों से अपनी तुलना करते हैं. इस वजह से धीरे-धीरे हमारे अंदर जलन की भावना घर करने लगती है. अपना मन दूसरों में लगाए रखने से आप यूहीं भटकते रहे जाएँगे. लेकिन हमें दूसरों से तुलना करने पर आखिर जलन क्यों होती है? 

वो इसलिए क्योंकि हम insecure हैं. एक इंसान के रूप में हम ख़ुद अपनी कदर नहीं करते, अपनी वैल्यू नहीं समझते. क्योंकि हमारा मन डर और डाउट से भरा रहता है तो हम ख़ुद को लेकर सिक्योर महसूस नहीं करते इसलिए हम उन लोगों से तुलना और मुकाबला करने में लग जाते हैं जो हमसे बेहतर कर रहे हैं.

Jesus ने इस स्ट्रगल को भी एक्सपीरियंस किया है. लेकिन जब उन्हें एहसास हुआ कि भगवान् ने उन्हें बहुत ख़ास बनाया है, हाँ ख़ास, ख़ास इसलिए कि पूरी दुनिया में बिलकुल उनके जैसा कोई दूसरा नहीं है. आप बिलकुल यूनिक हैं इस पूरी दुनिया में. ये वो सच है जिसे हम अनदेखा कर देते हैं और इसी सच ने जॉयस को वो आज़ादी दी जिसे वो ढूंढ रही थीं. ल्यूक के एक pasaage में बताया गया है कि Jesus  के शिष्य भी एक दूसरे से मुकाबला करते थे.

वो एक दूसरे से बहस करते कि Jesus  का सबसे बड़ा भक्त कौन है. Jesus  ने उनसे कहा कि जो ख़ुद को सबसे बड़ा शिष्य मानता है असल में वो सबसे बुरा शिष्य होगा. लेकिन ऐसा क्यों? जब Jesus इस संसार में थे तो उन्होंने सबको बताया कि भगवान् की दुनिया इस दुनिया से बिलकुल अलग और उल्टी है. ये बात मार्क के passage में भी है. Jesus  ने कहा कि इस दुनिया में जो पहला है वो स्वर्ग में आखरी होगा. ये दुनिया उन लोगों को तवज्जो देती है जो बेस्ट होते हैं.

हम सब बेस्ट स्टूडेंट, बेस्ट एम्प्लोई बनना चाहते हैं. लेकिन टॉप पर पहुँचने के बाद शांति और संतोष बड़ी मुश्किल से मिलती है. आप अपने अंदर सच्ची शांति तभी महसूस कर पाएँगे जब आप दूसरों के साथ होड़ करने की सोच से छुटकारा पा लेंगे. यहाँ तक कि जब हम सिर्फ़ मज़े के लिए खेलते हैं तब भी कहीं ना कहीं कम्पटीशन की भावना हमारे अंदर होती ही होती है. 

अगर आप बेस्ट बनना चाहते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है. हम अपना बेस्ट परफॉर्म करना चाहते हैं क्योंकि उससे हमें प्रमोशन मिल सकती है या अच्छे यूनिवर्सिटी में scholarship. लेकिन सबसे बड़ा प्रमोशन है भगवान् की नज़रों में उन पर अटूट विश्वास रखने वाले इंसान. जब आप उन्हें ध्यान में रखकर कोई काम करेंगे तो वो हमेशा आपका साथ देंगे. 

जलन हमें शरीर के मन से जोड़ती है. ऐसी भावनाओं का आत्मा के मन से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता. बल्कि इसे तो जंगल की मानसिकता का अहम् कारण भी कहा जाता है. अगली बार जब आपके दिल में किसी के प्रति जलन भावना पैदा होने लगे तो ख़ुद से पूछें – किसी से जलने से असल में मुझे क्या मिलेगा? क्या मुझे आशीर्वाद मिलेगा? भगवान् पर भरोसा रखें क्योंकि वो जानते हैं कि आपके लिए सबसे अच्छा क्या है.

भगवान् दूसरों के लिए क्या करते हैं, उन्हें क्या देते हैं उससे आपको कोई मतलब नहीं होना चाहिए. 

निष्कर्ष

आपने सीखा कि हम सभी शैतान के साथ एक स्पिरिचुअल जंग लड़ रहे हैं. हमारा मन वो जंग का मैदान है जहां  शैतान ने जंद छेड़ रखी है. उसे हमें मन के मैदान में ही लड़ कर हराना है. हर वो विचार जो भगवान् के खिलाफ़ है और ख़ुद को भगवान् के ज्ञान से भी ऊपर मानती है उसे आपको जड़ से उखाड़ कर फेंकना है.

असली प्रॉब्लम हमारे व्यवहार और विचार में होती है और शैतान जानता है कि अगर उसने हमारे विचार को कंट्रोल कर लिया तो हमारे एक्शन को भी कंट्रोल कर लेगा इसलिए वो ये जंग हमारे मन में लड़ता है. शैतान जानता है कि हमारा माइंड कितना पावरफुल है. वो हमारे मन में ऐसे किले बनाने लगता है जो हमें नेगेटिव बातें सोचने के लिए मजबूर करती हैं.

भगवान् ने हमें शैतान से लड़ने के लिए हथियार दिए हैं जो हैं भगवान् की कही हुई बातें को मानना, प्रार्थना और भगवान् की स्तुति करना. पॉजिटिव माइंड बनाना थोड़ा मुश्किल ज़रूर हो सकता है लेकिन नामुमकिन बिलकुल नहीं है और भगवान् ये उम्मीद नहीं करते कि आप इसे पाने के लिए अकेले ही संघर्ष करते रहे.

इसलिए उनसे मदद मांगें. बिना आवाज़ के भी दिल से निकली हुई सच्ची पुकार भगवान् सुन लेते हैं. शैतान हमेशा आपके दिमाग पर हमला करता रहेगा इसलिए भगवान् से ताकत मांगें. ख़ुद को भगवान् को समर्पित कर दें क्योंकि वो बहुत दयालु हैं. भगवान् ने अपने विचारों को ग्रंथों में लिख दिया है,

इसलिए भगवान् की बातों की रौशनी में अपने विचारों को चेक करें और अपने विचारों को उनके जैसा बनाने की कोशिश करें क्योंकि उनके विचार ही सबसे श्रेष्ठ हैं जिसमें सभी भलाई छुपी होती है. अपने मन में चल रहे विचारों को गहराई से समझें क्योंकि हम अक्सर अपने झूठे घमंड और अहंकार में रहते हैं जो ना सिर्फ़ हमारा बल्कि आस पास के लोगों की जिंदगी बर्बाद करने की ताकत रखता है. 

हम अक्सर शिकायत करते हैं कि भगवान् ने हमें इस दुनिया में अकेला भेज दिया या अकेला छोड़ दिया. नहीं, बिलकुल नहीं उन्होंने अपना एक अंश आत्मा के रूप में आपके साथ भेजा है. आत्मा से जो आवाज़ निकलती है वो कभी गलत राय नहीं देती इसलिए संसार की नहीं अपनी आत्मा की बात सुनें. 

ये बात कितना सुकून देती है ना कि कोई है जो हमेशा हमारी परवाह और चिंता करता है, चाहे पूरी दुनिया साथ छोड़ दे लेकिन वो कभी साथ नहीं छोड़ेंगे. वो हर वक़्त हमारे लिए मौजूद हैं बस उन्हें दिल से याद करने की देर है.

जब आपके मन में चलने वाली लड़ाई आपको थका देती है, घुटनों के बल झुका देती है तो घबराएं नहीं बस प्रार्थना कर भगवान् से मदद मांगें क्योंकि इस जंग में आप अकेले नहीं हैं भगवान् हर पल आपके साथ हैं इसलिए अंत में जीत तो आपकी ही होनी है बस भगवान् पर अपना विश्वास डगमगाने ना दें.  


 


 

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