विनोद कापरी की प्रवासी मजदूरो पर लिखी ‘1232 km: द लॉन्ग जर्नी होम’ शीर्षक पुस्तक की समीक्षा

विनोद कापरी की प्रवासी मजदूरो पर लिखी '1232 किमी: द लॉन्ग जर्नी होम' शीर्षक पुस्तक की समीक्षा
विनोद कापरी की प्रवासी मजदूरो पर लिखी ‘1232 किमी: द लॉन्ग जर्नी होम’ शीर्षक पुस्तक की समीक्षा
प्रकाशक HarperCollins (28 मई 2021)
भाषा
अंग्रेज़ी,हिंदी
पेपरबैक ‏ : ‎ 232 पेज
232 पेज
कंट्री ऑफ़ ओरिजिन
भारत
लेखकविनोद कापड़ी
1232 kms

लेखक के बारे में –

विनोद कापड़ी एक पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता हैं और उन्होंने अपनी 2014 की फिल्म (कैन टेक दिस शिट अनिमोर) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है। उनकी समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्म पीहू (2017) को एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में दो पुरस्कार मिले। फिल्म निर्माण में आने से पहले, उन्होंने अमर उजाला, ज़ी न्यूज़, स्टार न्यूज़, इंडिया टीवी और टीवी9 जैसे मीडिया संगठनों के साथ एक पत्रकार के रूप में अपने करियर के तेईस साल बिताए।

1232 km पुस्तक के बारे में

फिल्म निर्माता विनोद कापरी की ‘1232 km: The Long Journey Home’ नामक एक नई पुस्तक जो बिहार के सात प्रवासी श्रमिकों की यात्रा का वर्णन करती है, जो अपनी साइकिल पर घर वापस आए और सात दिनों के बाद अपने गंतव्य तक पहुंचे. यह पुस्तक हार्पर कॉलिन्स द्वारा प्रकाशित की गई है। मार्च 2020 में लगे देशव्यापी लॉकडाउन ने हजारों प्रवासी कामगारों को हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने पैतृक गाँव लौटने के लिए मजबूर कर दिया।

1232 km जबरदस्त बाधाओं का सामना करते हुए सात आदमियों के असाधारण साहस की कहानी है।

1232 km. ये कहानी लॉकडाउन में लड़खड़ाते कुछ मजबूर मजदूरों की कहानी नहीं है. हॉटस्टार पर रिलीज डॉक्यूमेट्री 1232 किलोमीटर जिंदादिली और जुझारू हिंदुस्तान की गलियों और गांव-मुहल्लों की कहानी है. उस पुलिस वाले की कहानी है जो पीटता नहीं, पूछता है कि कोई परेशानी तो नहीं? उस ट्रक वाले की कहानी है जो न जाने कितनी बार पुलिस से परेशान हो चुका है लेकिन मजदूरों का दर्द देख पुलिस की परवाह नहीं करता

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इसमें ऐसे ही कई संवाद मौजूद है जो आपको रोने, सोचने और बहुत कुछ कहने-लिखने पर मजबूर कर देंगे। COVID-19 Lockdown के बाद एक आंकड़ा यह आया था कि इस दौरान सबसे ज्यादा साईकल खरीदी गई। सामान्य समय मे यह आंकड़ा सुन पर्यावरण प्रेमी खुश होते मगर आज वजह कुछ और थी। यह सामान्य समय नही था मजदूरों ने साईकल खरीदी ताकि वो यह सो कॉल्ड स्मार्ट सिटी छोड़ सके।

कहानी लॉकडाउन की है लेकिन उसके परे चली जाती है जब बताती है कि मरते-खपते मजदूर जब अपने राज्य पहुंचते हैं तो 24 घंटे भूखा रहना पड़ता है. ठहरने के लिए कचरे के घूरे जैसा घर दिया जाता है. जैसे ये लम्हा चीखकर याद दिला रहा है कि यहां तुम्हारा घर होता तो बेघर क्यों होते? बेरहम शहर क्यों पहुंचते?

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